Saturday, December 11, 2021

चैतन्य पिसारा

 

आकाशाचा  मुकूट  ल्यावा

चंद्राचा  वर  हवाच  तुरा

वाऱ्याचे  पायी  बांधून  पैंजण

सृष्टीचा  प्यावा  सारा  पसारा

 

कुतुहलाचे  घालून  चिलखत

गूढ  तळ्यांचा  तळ  गाठावा

अरण्याच्या  शिरून  ऱ्हदयी

निबिडपणा  अन  मस्त लुटावा

 

झाडांशी  हितगूज  करता

पक्ष्यांनीही  मैफीलीत  असावे

रंगगंधांची  सोडून  भाषा

फुलांनीही  खळखळून  हसावे

 

गवती  लाटांसंगे  वहावे

कवेत  घ्यावे  डोंगर  सारे

कातळांची  भव्यता  कोरून  घ्यावी

उरात  भरूनी  सुसाट  वारे

 

घनघोर  झाडांच्या  गर्दीत

माझे  मीपण जावे  हरवून

कुबेरी  शिबीसम  छायेसाठी

मीही  पांघरावे  झाडांसम  ऊन

 

सजवून  नयनी  चंद्रआभा

निर्झर  दूडदूड  ऐकावा

अनाघ्रात  आनंद  तो  झाडांचा

फुलून  असा  मी  संभोगावा

 

आकाशाचा  मुकूट  ल्यावा

चंद्राचा  वर  हवाच  तुरा

वल्कले  ल्यावी  पुन्हा  पानांची

अन  फुलवावा  मी  चैतन्य पिसारा.

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